भारत की इकलौती रेलवे लाइन, जो सरकारी नहीं प्राइवेट है,ये है आजाद भारत में गुलामी की निशानी, इसके लिए ब्रिटेन वसूलता है लगान

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(सुधीर सलूजा) : जैसा कि हम सभी को मालूम हैं की हमारे देश की रेल व्यवस्था सरकार के हाथ में हैं और इस काम में किसी भी प्राइवेट कम्पनी को काम नहीं दिया जाता हैं ।अगर आप भी ऐसा ही सोचते हैं तो आप लगभग सही सोच रहे हैं ।जी हाँ दोस्तों हमने लगभग इस वजह से कहा क्यूंकि हमारे देश में अभी तक रेलवे का एक ऐसा टुकड़ा हैं जो हमारी सरकार के हाथ में नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार के हाथ में हैं ।शायद ये अंग्रेजो की आखरी निशानी हैं जो हमारे  भारत में आज में भी मौजूद हैं ।

अंग्रेजों को भारत छोड़े तकरीबन 71 साल हो गए लेकिन आज भी गुलामी की एक निशानी हमारे देश में मौजूद है। आज भी एक रेलवे ट्रैक ब्रिटेन के कब्जे में है। नैरो गेज (छोटी लाइन) के इस ट्रैक का इस्तेमाल करने वाली इंडियन रेलवे हर साल एक करोड़ 20 लाख की रॉयल्टी ब्रिटेन की एक प्राइवेट कंपनी को देनी पड़ती है। इस ट्रैक पर सिर्फ एक ट्रेन …
– इस रेल ट्रैक पर शकुंतला एक्सप्रेस के नाम से सिर्फ एक पैसेंजर ट्रेन चलती है।
– अमरावती से मुर्तजापुर के 189 किलोमीटर के इस सफर को यह 6-7 घंटे में पूरा करती है।
– अपने इस सफर में शकुंतला एक्सप्रेस अचलपुर, यवतमाल समेत 17 छोटे-बड़े स्टेशनों पर रुकती है।
– 100 साल पुरानी 5 डिब्बों की इस ट्रेन को 70 साल तक स्टीम का इंजन खींचता था। इसे 1921 में ब्रिटेन के मैनचेस्टर में बनाया गया था।
– 15 अप्रैल 1994 को शकुंतला एक्प्रेस के स्टीम इंजन को डीजल इंजन से रिप्लेस कर दिया गया।
– इस रेल रूट पर लगे सिग्नल आज भी ब्रिटिशकालीन हैं। इनका निर्माण इंग्लैंड के लिवरपूल में 1895 में हुआ था।
– 7 कोच वाली इस पैसेंजर ट्रेन में प्रतिदिन एक हजार से ज्यादा लोग ट्रेवल करते हैं।
देनी पड़ती है 1 करोड़ 20 लाख की रॉयल्टी
– इस रूट पर चलने वाली शकुंतला एक्सप्रेस के कारण इसे ‘शकुंतला रेल रूट’ के नाम से भी जाना जाता है।
– अमरावती का इलाका अपने कपास के लिए पूरे देश में फेमस था। कपास को मुंबई पोर्ट तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजों ने इसका निर्माण करवाया था।
– 1903 में ब्रिटिश कंपनी क्लिक निक्सन की ओर से शुरू किया गया रेल ट्रैक को बिछाने का काम 1916 में जाकर पूरा हुआ।
– 1857 में स्थापित इस कंपनी को आज सेंट्रल प्रोविन्स रेलवे कंपनी के नाम से जाना जाता है।
– ब्रिटिशकाल में प्राइवेट फर्म ही रेल नेटवर्क को फैलाने का काम करती थी।
– 1951 में भारतीय रेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। सिर्फ यही रूट भारत सरकार के अधीन नहीं था।
– इस रेल रूट के बदले भारत सरकार हर साल इस कंपनी को 1 करोड़ 20 लाख की रॉयल्टी देती है।
खस्ताहाल है ट्रैक
– आज भी इस ट्रैक पर ब्रिटेन की इस कंपनी का कब्जा है। इसके देख-रेख की पूरी जिम्मेदारी भी इसपर ही है।
– हर साल पैसा देने के बावजूद यह ट्रैक बेहद जर्जर है। रेलवे सूत्रों का कहना है कि, पिछले 60 साल से इसकी मरम्मत भी नहीं हुई है।
– इसपर चलने वाले जेडीएम सीरीज के डीजल लोको इंजन की अधिकतम गति 20 किलोमीटर प्रति घंटे रखी जाती है।
– इस सेंट्रल रेलवे के 150 कर्मचारी इस घाटे के मार्ग को संचालित करने में आज भी लगे हैं।
दो बार बंद भी हुई
– इस ट्रैक पर चलने वाली शकुंतला एक्सप्रेस पहली बार 2014 में और दूसरी बार अप्रैल 2016 में बंद किया गया था।
– स्थानीय लोगों की मांग और सांसद आनंद राव के दबाव में सरकार को फिर से इसे शुरू करना पड़ा।
– सांसद आनंद राव का कहना है कि, यह ट्रेन अमरावती के लोगों की लाइफ लाइन है। अगर यह बंद हुई तो गरीब लोगों को बहुत दिक्कत होगी।
– आनंद राव ने इस नैरो गेज को ब्रॉड गेज में कन्वर्ट करने का प्रस्ताव भी रेलवे बोर्ड को भेजा है।
– भारत सरकार ने इस ट्रैक को कई बार खरीदने का प्रयास भी किया लेकिन तकनीकी कारणों से वह संभव नहीं हो सका।

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