मात्र 14 साल की उम्र में फकीरचंद जैन को अंग्रेजों ने दी फांसी

Fakirchand Jain was hanged by the British at the age of just 14

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गुरुग्राम। आजादी के आंदोलन में अहीरवाल समेत पूरे हरियाणा के अग्र वीरों ने जो शौर्य दिखाया, वह आज की पीढ़ी को याद रखना जरूरी है। सिर्फ व्यापार और दुकानदार नहीं, बल्कि अग्रवाल समाज ने 1857 की क्रांति से लेकर आजादी तक अनेक बलिदान दिए हैं। हम आपको अहीरवाल के अलावा हरियाणा के उन वीरों के जीवन की गाथा से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई। सबसे कम उम्र के अग्र समाज से बलिदानी फकीरचंद ने 14 साल की उम्र में बलिदान दिया। ऐसे वीरों की बलिदान गाथा यहां शनिवार 1 अक्टूबर को होने वाले अग्रसेन जयंती समारोह अग्रसमागम-2022 में दिखाई जाएगी।

सिरसा की चांदबाई व परिवार का बलिदान अविस्मरणीय

हरियाणा के सिरसा की रहने वाली चांद बाई के बलिदान को भी भुलाना नहीं जा सकता। श्यामलाल सत्याग्रही की धर्मपत्नी चांद बाई असहयोग आंदोलन में सबसे पहले अपने परिवार के कपड़े इकट्ठे किए और उनकी होली जलाने में अपने पति का साथ दिया। वर्ष 1922-23 में चांद बाई व उनके पुत्र गांधी जी के साबरमती आश्रम में रहे। व्यक्तिगत सत्याग्रह में सक्रियता से भाग लेने के कारण उन्हें पुत्र के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। छह महीने की कैद की सजा सुनाते हुए उन्हें लाहौर जेल भेज दिया गया, जबकि उनके पुत्र मदन गोपाल को 9 माह की सजा सुनाकर गुजरात स्पेशल जेल भेजा गया।

फकीरचंद जैन ने 14 साल की उम्र में दी शहादत

हरियाणा के हांसी के रहने वाले फकीरचंद जैन भी अग्र वंश का नाम रोशन करने वाली शख्सियत थे। उनका जन्म 1845 में हुआ था। बचपन से ही वे अपने चाचा हुकमचंद जैन के साथ अधिक समय व्यतीत करते थे। मुगल सम्राट बादशाह बहादुर शाह जफर ने अपने दरबार में उन्हें सम्मानित किया था। 19 जनवरी 1858 को हांसी में लाला जी की हवेली के सामने हुकमचंद एवं मिर्जा मुनीर बेग को फांसी पर लटकाया जा रहा था। अंग्रेजों के खिलाफ बोलने पर बालक फकीरचंद को भी गिरफ्तार कर लिया। बिना किसी मुकदमें के ही चाचा हुकमचंद के साथ फकीरचंद जैन को भी फांसी दे दी गई। इस तरह से मात्र 14 साल की उम्र में फकीरचंद जैन ने देश के लिए कुर्बानी दी और मौत सामने देखकर भी डरे नहीं।

15 साल की उम्र में आंदोलन में कूदे दर्शन लाल

हरियाणा के जगाधरी के रहने वाले पद्मभूषण दर्शन लाल जैन सिंगला का जन्म 12 दिसम्बर 1927 को हुआ था। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावनाएं हिलौरे लेतीं थी। वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संपर्क में आए। वे गांधीजी से भी प्रेरित थे। ब्रिटिश शासन के दौरान जब गणवेश के रूप में खादी पर प्रतिबंध था, तब वे खादी पहनकर स्कूल जाते थे। 15 साल की उम्र में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। उन्हें राष्ट्र हित में किए गए अनेक कार्यों की बदौलत वर्ष 2019 में भारत सरकार के सर्वोच्च पुरस्कारों में से एक पद्मभूषण से नवाजा गया। तत्कालीन वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में दर्शन लाल जैन को राज्यपाल पद और डीएवी कालेज फॉर गर्ल्स के संस्थापक बने। दर्शनलाल जैन सिंगला ने 20 वर्षों तक भारत विकास परिषद हरियाणा और 30 वर्षों तक वनवासी कल्याण आश्रम तथा गीता निकेतन एजुकेशन सोसायटी का नेतृत्व किया।

गांधी जी के आह्वान पर आंदोलन में कूदे रफ्तामल

वर्ष 1878 में लाला रफ्तामल अग्रवाल के घर जन्में श्यामलाल सत्याग्रही पेशे से वकील थे। वे सिरसा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। वर्ष 1920 में वकालत छोड़कर गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 15 जनवरी 1922 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। छह माह के लिए उन्हें अंबाला जेल में कैद में रखा गया। श्यामलाल सत्याग्रही वर्ष 1923 में पंजाब विधान परिषद के सदस्य ओर 1940 में केंद्रीय विधानसभा (वर्तमान में लोकसभा) के सदस्य बनें।

झुके नहीं, हंसते हुए फांसी पर लटक गए लाल हुकमचंद जैन

वर्ष 1816 में लाला दुनीचंद जैन के घर जन्में लाला हुकमचंद जैन बचपन से ही मेधावी थी। अपनी प्रतिभा को आधार बनाकर उन्होंने मुगल बादशाह के दरबार मे निष्ठापूर्ण और सराहनीय सेवाएं देने के बाद वे वापिस हांसी लौट आए। इस बीच हरियाणा पर अंग्रेज काबिज हो गए और इसे अपने अधीन कर लिया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजते ही लाला हुकमचंद जैन ने बहादुरशाह जफर से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ युद्ध करने की पेशकश की। बहादुरशाह जफर ने उन्हें हर तरह से सहायता देने का भरोसा दिलाया। दिल्ली के कमिश्नर सीएस सांडरस ने हुकुमचंद जैन और मिर्जा मुनीर बेग को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाकर उन्हें फांसी की सजा सुना दी। 19 जनवरी 1958 को लाल हुकमचंद जैन व मिर्जा मुनीर बेग को लाला जी के घर के सामने ही फांसी पर लटका दिया गया।

लाला देशबंधु गुप्ता ने पत्नी व पुत्र को साथ लेकर लड़ी लड़ाई

इसी तरह से लाला देशबंधु गुप्ता पानीपत वाले ने भी आजादी आंदोलन में अपनी महत्ती भूमिका निभाई। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए जा रहे प्रत्येक आंदोलन में भाग लेकर उसके साथ आमजन को जोड़ा। अंग्रेज सरकार की आंखों की किरकिरी बनने के बावजूद आंदोलन की राह पर वे आगे बढ़ते रहे। कई बार उन्हें जेल भेजा गया। वर्ष 1932 में उनकी धर्मपत्नी सोना देवी ने भी महिलाओं को आंदोलन से जोड़ा। जिस कारण उन्हें 3 महीने की सजा भुगतनी पड़ी। उनके 15 साल के पुत्र को भी गिरफ्तार किया गया। लाला देशबंधु गुप्ता ने वंदे मातरम समाचार पत्र समेत अन्य समाचार पत्रों में संपादकीय के माध्यम से अंग्रेज सरकार को परेशान किया। दिल्ली क्षेत्र में संसद सदस्य वे चुने गए। स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने के लिए गठित कमेटी में वे भी एक प्रतिनिधि के रूप में शामिल रहे। 21 नवम्बर 1951 को एक हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

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